ईश्वर कहां हैं?
ईश्वर कहाँ है? यह प्रश्न उतना ही पुराना है जितना कि मानवीय चेतना। अक्सर हम ईश्वर को सातवें आसमान पर, कैलाश की चोटियों में, क्षीर सागर की गहराइयों में या मंदिरों की बंद कोठरियों में ढूँढते हैं। हम हाथ जोड़कर खड़े होते हैं और इस आशा में प्रार्थना करते हैं कि कहीं दूर बैठा कोई सर्वशक्तिमान हमारी पुकार सुनेगा और अपनी उपस्थिति दर्ज कराएगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि ईश्वर कोई 'बाहरी इकाई' नहीं है जिसकी उपस्थिति की प्रतीक्षा की जाए। वह तो एक 'अनुभव' है जिसे भीतर जगाया जाता है। उपस्थिति की आशा बनाम तलाश का संकल्प अक्सर हमारी पूजा एक 'लेन-देन' या 'प्रतीक्षा' बन जाती है। हम पूजा करते हैं ताकि ईश्वर आए, हमारी बाधाएं दूर करे या हमें दर्शन दे। यह एक याचक की स्थिति है। लेकिन वास्तविक आध्यात्मिकता हमें याचक नहीं, 'खोजी' ( Seeker) बनने की प्रेरणा देती है। ईश्वर की उपस्थिति की आशा करने का अर्थ है कि हम उसे स्वयं से अलग मान रहे हैं। जब हम उसे अपने से अलग मानते हैं, तो हम द्वैत ( Duality) में जी रहे होते हैं। जबकि भारतीय दर्शन का मूल 'अद्वैत' है...