ईश्वर कहां हैं?
ईश्वर कहाँ है? यह प्रश्न उतना ही पुराना है जितना कि मानवीय
चेतना। अक्सर हम ईश्वर को सातवें आसमान पर, कैलाश की चोटियों में, क्षीर सागर की
गहराइयों में या मंदिरों की बंद कोठरियों में ढूँढते हैं। हम हाथ जोड़कर खड़े होते
हैं और इस आशा में प्रार्थना करते हैं कि कहीं दूर बैठा कोई सर्वशक्तिमान हमारी
पुकार सुनेगा और अपनी उपस्थिति दर्ज कराएगा।
लेकिन वास्तविकता यह है कि ईश्वर कोई 'बाहरी इकाई' नहीं है जिसकी
उपस्थिति की प्रतीक्षा की जाए। वह तो एक 'अनुभव' है जिसे भीतर जगाया जाता है।
उपस्थिति की आशा बनाम तलाश का संकल्प
अक्सर हमारी पूजा एक 'लेन-देन' या 'प्रतीक्षा' बन जाती है। हम पूजा
करते हैं ताकि ईश्वर आए, हमारी बाधाएं दूर करे या हमें दर्शन दे। यह एक याचक की
स्थिति है। लेकिन वास्तविक आध्यात्मिकता हमें याचक नहीं, 'खोजी' (Seeker) बनने की प्रेरणा देती है।
ईश्वर की उपस्थिति की आशा करने का अर्थ है कि हम उसे स्वयं से अलग
मान रहे हैं। जब हम उसे अपने से अलग मानते हैं, तो हम द्वैत (Duality) में जी रहे होते
हैं। जबकि भारतीय दर्शन का मूल 'अद्वैत' है—अर्थात वह और मैं अलग नहीं हैं। इसलिए,
पूजा का उद्देश्य उसे बुलाना नहीं, बल्कि उस परत को हटाना होना चाहिए जो हमें उसे
देखने से रोक रही है।
मंदिर के बाहर और भीतर
कबीर ने बहुत सटीक कहा था:
"मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे, मैं
तो तेरे पास में।"
यदि ईश्वर कण-कण में है, तो वह आपके हृदय की धड़कन में भी है। पूजा
का असली अर्थ है 'आत्मसात करना'। आत्मसात करने का अर्थ है—अपने भीतर के अहंकार,
क्रोध और अज्ञान को विसर्जित कर देना ताकि जो शेष बचे, वह केवल वही चैतन्य तत्व
(ईश्वर) हो। जब एक मूर्तिकार पत्थर को तराशता है, तो वह बाहर से कुछ जोड़ता नहीं
है, बल्कि पत्थर के उन हिस्सों को हटा देता है जो मूर्ति नहीं हैं। पूजा भी वही
प्रक्रिया है—अपने भीतर से 'कचरा' हटाना ताकि 'परमात्मा' प्रकट हो सके।
आत्मसात करने की प्रक्रिया: कैसे खोजें?
ईश्वर को खोजने के लिए हिमालय जाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि
अपने भीतर की परतों को खोलने की आवश्यकता है। इसके तीन मुख्य सोपान हो सकते हैं:
1. मौन और आत्म-निरीक्षण: शोर में ईश्वर नहीं मिलता। जब बाहर का कोलाहल शांत होता है, तब
भीतर की आवाज सुनाई देती है। ध्यान (Meditation) वह पूजा है जिसमें हम ईश्वर से बात नहीं करते, बल्कि उसे 'सुनते'
हैं।
2. सेवा और करुणा: यदि ईश्वर हर जीव में है, तो किसी दुखी की सेवा करना ही सबसे बड़ी
पूजा है। जब आप किसी के आंसू पोंछते हैं, तब आप ईश्वर को किसी प्रतिमा में नहीं, बल्कि जीवंत रूप में
आत्मसात कर रहे होते हैं।
3. समर्पण (Surrender): आत्मसात करने का सबसे बड़ा बाधक है 'मैं'। "मैं कर रहा
हूँ", "यह मेरा है"—यही वह पर्दा है। जिस क्षण यह 'मैं' मिटता है,
ईश्वर स्वतः प्रकट हो जाता है।
निष्कर्ष
ईश्वर कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे कहीं से 'प्राप्त' किया जाए। वह
तो एक संगीत की तरह है जो बज तो रहा है, बस हमने अपने कान बंद कर रखे हैं। पूजा को
एक अनुष्ठान (Ritual) से ऊपर उठाकर एक अनुसंधान (Research)
बनाइए। उसे आकाश में मत ढूँढिए, उसे
अपने आचरण में, अपनी दया में और अपनी शांति में तलाशिए।
जब आप उसे अपने भीतर आत्मसात कर लेंगे, तब आपको मंदिर जाने की
जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि आप जहाँ खड़े होंगे, वहीं देवालय बन जाएगा। ईश्वर 'वहाँ'
नहीं है, ईश्वर 'यहीं' है, और सबसे बढ़कर, वह 'आप' में है।
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